Saturday, August 17, 2013

क्या बच्चों के मुँह से मध्यान्ह भोजन के निवाले छीनने की साज़िश हो रही है ?




भारत के प्रधानमंत्री स्व’ नरसिम्हाराव जी के ज़माने में जब सभी सरकारी स्कूलों में भोजन की व्यव्स्था प्रारंभ करी गयी तब उसका प्रभाव उस समय के लोकसभा के चुनावों पर भी झलका था और कांग्रेस की सरकार को पुन सफ़लता मिली थी। अब जब की 2014 के आम चुनाव नज़दीक हैं, हमें इस तथ्य की पड़ताल करनी चाहिये कि क्या भारत में आँगनवाड़ियों, सरकारी एवं गैर-सरकारी किंतु मान्यता प्राप्त प्राथमिक एवं मिडिल स्तर के स्कूलों में जो मध्यान्ह भोजन ( एम-डी-एम या मिड डे मील ) दिया जा रहा है ,उसके पीछे का खेल क्या है ?
 
1- मध्यान्ह भोजन की राशि ज़िला स्तर पर कहाँ से मिलती है ?


Text Box: फ़ोटो सौ-- परवेज़ अमीर, 2012 जन्, भोपाल, भारतम प्र में मध्यान्ह भोजन की राशि का आवंटन ज़िला पंचायत से कर के विकास खण्ड के जनपद पंचायत के माध्यम से सीधे उन इकाईयों के बैंक खातों में जमा कराई जाती है जो मध्यान्ह भोजन सप्लाई करते हैं। इसका मतलब यह है कि प्रथमिक एवं मिडिल स्तर के स्कूलों में जो मध्यान्ह भोजन सप्लाई करनेवाले स्वयं-सहायता समूह हैं उनके बैंक खाते में उस समूह के द्वारा सप्लाई किये गये मध्यान्ह भोजन के औसत के मान से कोई राशि का आंकलन कर के प्रति बच्चे के अनुसार तीन माह की अग्रिम [ एड्वांस ] राशि जमा करा दी जाती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि ज़िला स्तर पर ज़िला पंचायत को सब मालूम  रह्ता  है   कि  किस  गाँव  में  मध्यान्ह भोजन कि  कितनी राशि , किसको  एवं  कब मिली है अथवा  नहीं  मिली। 
आँगनवाड़ियों के लिये भी यही व्यवस्था है जहाँ पर आँगनवाड़ी कार्यकर्ता ही सर्वे सर्वा हैं और राशि के आवंटन की जानकारी ज़िला कार्यक्रम अधिकारी को रहती है। यहाँ पर राशि का लेन-देन ज़िला स्तर पर होता है।

कई बार मध्यान्ह भोजन के सप्लायर-स्वयं-सहायता समूह अकसर यह शिकायत करते रहे हैं कि ज़िला/ ब्लाक स्तर के मध्यान्ह भोजन के नोडल अधिकारी एवं बाबुओं को बिना कुछ लिये-दिये यह राशि लेना कठिन ही है ।

2, सप्लायर-स्वयं-सहायता समूह कैसे-कैसे ?

मध्यान्ह भोजन के सप्लायर , महिलाओं के स्वयं-सहायता समूह ही हैं। जब हम आम स्वयं-सहायता समूह की बात करते हैं तो उस को स्थानीय महिलाओं के लोकतांत्रिक, पारदर्शी, सशक्त एवं जागरूक सप्लायर-स्वयं-सहायता समूह की कल्पना करते हैं परंतु वास्तव में यह सप्लायर-स्वयं-सहायता समूह तो स्कूल के टीचरों या आँगनवाड़ी की कार्यकर्ताओं के द्वारा बनाये गये ड्मी सप्लायर-स्वयं-सहायता समूह हैं जिसका सम्पूर्ण नियंत्रण इन्हीं सरकारी लोगों के पास रहता है ।
 सप्लायर-स्वयं-सहायता समूह के पास न तो कोई सही जानकारी मिलती और न ही कोई वास्तविक रिकार्ड । बैंक की पास बुक, बिल, नगद, रजिस्टर, आदि सब इन्ही लोगों के पास मिलता है और मध्यान्ह भोजन का पूरा हिसाब किताब समूह के अध्यक्ष – सचिव तक को नहीं पता होता। इसलिये समूह के द्वारा औडिट करवाना भी संभव नहीं होता ।

जहाँ कहीं [ खास तौर पर बड़े शहरों में ] पर कोई गैर सरकारी संस्था मध्यान्ह भोजन की सप्लाई में लगी है वहाँ पर उसकी किसी राजनीतिक पार्टी से नज़दीकियां साफ़ नज़र आयेंगी ,जिसका मतलाब यह है कि मध्यान्ह भोजन कि गुणवत्ता के साथ खिलवाड़ हो रहा होगा और इस पवित्र कार्य को बदनाम किया जा रहा होगा।

3 मध्यान्ह भोजन और मंहगाई ?

Double Bracket: सबसे पहला दोष उस व्यवस्था का है जो वर्तमान में स्कूल के टीचर और आँगनवाड़ी की कार्यकर्ताओं की है जिन्होंने मध्यान्ह भोजन की सप्लाई का सारा नियंत्रण अपने हाथों में ले रखा है और स्थानीय सप्लायर-स्वयं-सहायता समूह को अपना ग़ुलाम बना लिया है। 
मध्यान्ह भोजन की मात्रा काफ़ी कम है क्योंकि बढ़ती हुई महंगाई के अनुसार इसके प्रति मध्यान्ह भोजन के हिसब से कोई बढ़ौत्तरी नहीं करी जाती है जिसके के कारण मध्यान्ह भोजन की मात्रा एव गुणवत्ता में निरन्तर गिरावट आ रही है।

बी पी एल का खाद्यान्न, जलाऊ लकड़ियां, तेल, सब्ज़ी, मसाला और पानी के लिये अलग खर्चे और महगाई के कारण मध्यान्ह भोजन पका कर बच्चों को देना एक अग्नि परीक्षा से कम नहीं लेकिन फ़िर भी यह कार्य उसको चलाने वालों को लुभा रहा है इसकी मूल वजह क्या है ? मध्यान्ह भोजन के खेल में जब इतना मुनाफ़ा है तो भला कौन इसे छोड़ना चाहेगा ?

जब सप्लायर-स्वयं-सहायता समूह के माध्यम से दिया जा सकता है तो फ़िर इस पूरी व्यवस्था को ध्वस्त करने में कौन लगा है ?
हाल ही में बिहार में हुई त्रासदी के बाद अनेक स्थानों में इस तरह कि शिकायतें मिल रही हैं। बैतुल ज़िले में भी गत 14 अगस्त को एक प्राथमिक शाला में 71 बच्चे बीमार हो गये थे जिसका खामियाज़ा उन मासूम बच्चों अलावा उस स्कूल के प्रधान पाठक, सप्लायर-स्वयं-सहायता समूह के पदाधिकारियों एवं भोजन के रसोईयों के खिलाफ़ पुलिस केस के रूप में देखा गया है। इन घटनाओं के माध्यम से आम जनता को यह संदेश दिया जा रहा है कि पौष्टिक मध्यान्ह भोजन किसी स्थानीय सप्लायर-स्वयं-सहायता समूह के माध्यम से स्कूली एवं आँगनवाड़ी के मासूम बच्चों को अब नहीं दिया जा सकता है। 
यह हाद्से अचानक ही इतने क्यों बढ़ गये हैं ?
क्या पर्दे के पीछे भी कोई खेल हो रहा है ?
सबसे पहला दोष उस व्यवस्था का है जो वर्तमान में स्कूल के टीचर और आँगनवाड़ी की कार्यकर्ताओं की है जिन्होंने मध्यान्ह भोजन की सप्लाई का सारा नियंत्रण अपने हाथों में ले रखा है और स्थानीय सप्लायर-स्वयं-सहायता समूह को अपना ग़ुलाम बना लिया है। इस तरह सारा मुनाफ़ा भी इन्हीं के पास जा रहा है। स्कूल का पूरा स्टाफ़, अतिथिगण,आँगनवाड़ी की कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को तो प्रति कार्यदिवस ताज़ा और पका हुआ खाना मिल रहा है वो अलग । यह मध्यान्ह भोजन की मूल अवधारणा के बिल्कुल विपरीत कार्य हो रहा है।
दूसरा कारण , मध्यान्ह भोजन की सप्लाई मे जो मुनाफ़ा आज भी हो रहा है, उसको देखते हुये गाँव में भी स्थानीय सप्लायर-स्वयं-सहायता समूह के कई दुश्मन पैदा हो गये हैं जो हर वह मौका देखते रहते हैं जहाँ वह उसको और उससे जुड़े स्कूल के टीचरों और आँगनवाड़ी की कार्यकर्ताओं को नीचा दिखा कर उन्हें पुलिसिया लपेटे में लेकर, कोर्ट के चक्कर मे फ़ंसा सकें। इसमें कई बार तो शासन के वरिष्ठ अधिकारीगण और गाँव के ही अमीर और उच्च जाति के लोग भी शामिल पाये जाते हैं।
तीसरा , और अहम, किरदार उन बड़ी प्राईवेट कम्पनियों का है जो  के लिये आवंटन यानी की बजट को दो य तीन गुणा बढ़वा कर मध्यान्ह भोजन  के सप्लाई मे शामिल होना चाहती हैं। भोजन के अधिकार बिल में भी इसका प्रावधान केंद्र की सरकार ने कर दिया है कि कुपोषण को दूर करने के लिये सरकार आगामी किसी समय से देश के ग़रीबों को अनाज के स्थान पर           “ फ़ोर्टीफ़ाईड ”  [ यानी किसी महंगे, बहुत बड़े, आधुनिक, मशीनी कारखाने में गेंहूँ और मोटे अनाजों को पीस कर उसमें उचित मात्रा में प्रोटीनों, विटामिनों, चर्बी, नमक, स्वाद एवं प्रसंकरण तत्व को मिला कर उनको 10 या 20 किलोग्राम के पैकेटों मे पैक किया जायेगा जिससे उसकी “पौष्टिक्ता” बनी रहे ! ] यही आटा या कच्चा पैक्ड-फ़ूड राशन की दुकानों पर उपलब्ध करवायेगी। इन बड़ी प्राईवेट कम्पनियों के मालिक भी बड़े-बड़े पूँजीपति , औद्योगिक घरानें, बहु-राष्ट्रीय कम्पनियां    [ जो कि समाजिक सरोकार के कार्यों  या सी एस आर के नाम से भी यह कर सकती हैं ] या फ़िर राजनैतिक दम-खम वाले लोग ही होंगे जिनको कोई भी राजनैतिक पार्टी अपने चुनावी चंदे के लिये सम्पर्क करेंगी। वार्तमान की व्यवस्था से राजनैतिक पार्टी को ना तो चुनावी फ़ंड मिल रहा , न ही एक मुश्त वोट।

याद रहे कि ग़रीब के बच्चे ही तो भारत में आँगनवाड़ियों, सरकारी एवं गैर-सरकारी किंतु मान्यता प्राप्त प्राथमिक एवं मिडिल स्तर के स्कूलों में पढ़ने आते हैं सो उनको भी “ फ़ोर्टीफ़ाईड ”  मध्यान्ह भोजन सप्लाई करने की योजना इन बड़ी कम्पनियों ने बना रखी है और यही है इन बच्चों के मुँह से मध्यान्ह भोजन के निवाले छीनने की साज़िश ।  

यह साजिश , इन्हीं ग़रीब-बच्चों के खिलाफ़ है !

Parvez Ameer is a social scientist working with the poorer sections of the society in and lives in the Central part of India.
An occasional blogger.

Wednesday, July 24, 2013

Bicycles - Gender bias for free ?



We have a welfare scheme of the Madhya Pradesh State Government (suitably and amply co-financed by the Central Government also ) which provides for the free purchase of a bicycle for all the girls attending the High Schools in the Government Schools. The idea of providing free bicycles to the girls is to facilitate an easy approach for the girls as the Middle and High Secondary Schools are generally located away from the smaller villages and it may be difficult for the girls to go there on foot. These schools may be located seven to ten kilometers away from their villages.
The bicycles are a gift from the State Government for each girl. The quality of the bikes may not be very satisfactory but then it is an instrument to sustain the enrolment and attendance of the girls at the post- primary level schooling.
Gender bias in education
Girls are discouraged from attending the schools after the Middle level. They are forced to remain at home to look after the younger siblings, cook food, attend to the daily house chores, fetch drinking water from the nearby water source and avoid getting education beyond sixth or seventh classes.
The boys are encouraged to go to schools upto college level, not attend the domestic works, enjoy friendship outings late nights, attend parties on behalf of the family and interfere with the lives of their sisters who contribute at homes.

Sunday, July 21, 2013

“आपका पैसा , बिचौलियों के हाथ में !!”




भारत सरकार नें 01 जनवरी, 2013 से देश के चुनिंदा 51 ज़िलों में कैश-सब्सिडी योजना लागू करी है, जिसे उसने, “आपका पैसा, आपके हाथ में ” योजना कह कर पुकारा है । मध्य प्रदेश के होशंगाबाद एवं हरदा ज़िलों को भी इसमें शामिल किया गया है। यह योजना उन ज़िलों में प्रारंभ होना बताया गया है जहां पर आधार कार्ड का काम 80% या उस से अधिक हो चुका है।

 सरकार ने दावा किया है कि यह योजना एक “गेम चेंजर” का रूप ले लेगी जिस से यू पी ए की सरकार को 2014 के लोकसभा के चुनावों मे भारी सफ़लता मिलेगी। यू पी ए की सरकार में शामिल कांग्रेस पार्टी को यही उम्मीद है कि वोटर उसे 2014 में वोट दे कर केन्द्र में फ़िर से सरकार बनानें का मौका देगा ।
यह तो हुआ एक सरकारी ख्याली-पुलाव, चुनावी-खिचड़ी की देग़ तो पकने के लिये आग पर चढा दी गयी है ,
और वह जब तक पके आईए हम कुछ बातों की पड़ताल कर लें ।

इसमें कुछ भी तो नया नहीं है ?

जब सरकार ने यह कहा की वह इस में 29 योजनाओं को शामिल करेगी तो यह ठीक ही था कि ग़रीब को ज़्यादा भटकना नहीं पड़ता और उसे सरकारी मदद घर पर ही मिल जाती। वर्तमान में ग़रीबों को उनकी पत्रता के अनुसार बच्चों  को वज़ीफ़ा,इन्द्रा आवास,जननी सुरक्षा , व्रिद्धाव्स्था- पेंशन , मनरेगा जैसे अहम योजनाओं का भुगतान बैंक, सह्कारी समितियों की बैंकें अथवा पोस्ट आफ़िसों के माध्यम से नगद भुगतान हो रहा है। इसका मतलब यह है कि इन योजनाओं का लाभ लेना है तो लाभार्थी को इन बैंकों या पोस्ट आफ़िसों में अपने खाता खोलना ही पड़ता है । सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिये आप को पता ही है कि किस प्रकार से , अर्थात , हर प्रकार से , परेशान किया जाता है। कई बार बैंकें किसी ग़रीब का खाता खोलने से भी मना कर देती हैं और उन पर नई-नई शर्तें लगा देतीं हैं।
होशंगाबाद ज़िले में आदिम जाति विभाग ने प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि कैश सब्सिडी योजना का लाभ वर्तमान में केवल आदिम जाति विभाग, स्कूल शिक्षा विभाग तथा पिछ्ड़ा वर्ग एव अल्पसंख्यक कल्याण विभाग द्वारा दी जा रही पोस्ट मैट्रिक , प्री मैट्रिक एव प्रवीणिय छात्रव्रित्त्ति तथा स्वास्थ्य एव परिवार कल्याण विभाग द्वारा संचालित जननी सुरक्षा के हित्ग्राहियों के लिये ही लागू करी गयी है। इन योजनाओं के अलावा कोई दूसरी कैश सब्सिडी का लाभ जैसे केरोसिन, एल पी जी गैस, उर्वरक की सब्सिडी , पेंशन की राशि का नगद ह्स्तांतरण जनवरी माह 2013 से नहीं किया जाएगा। तो इस योजना में नया कुछ भी नहीं।
वास्तव में इस की असली परीक्षा तो तब होगी जब इस को पी डी एस के राशन , एल पी जी के सिलेंडर और केरोसिन के तेल को उप्लब्ध करवाने से जोड़ा जायेगा । देखना होगा कि उस स्तर पर जाने से पूर्व इस को किस तरह से सरकार गावों तक ले जाती है।

बैंकों को ही , फ़िर से ,“ साहूकार ” बनाया !

तो इस योजना में हरेक लाभार्थी को अपने निवास के निकट के किसी बैंक में एक खाता खुलवाना होगा । खाता खोल कर उस में रुपये जमा कर देना एक पहलू है परंतु इसी खातें में कैश का हस्तांतरण हो जायेगा इस के लिये  उस लाभार्थी को बाज़ार-भाव से इन सामग्रियों को क्रय करना होगा। सारा पेंच इस “क्रय” करनें में ही है। 

पहली बात यह कि उसके पास इतना नगद हो कि वह राशन की दुकान से सामान को नगद में खरीद सके, यदि उसके पास नगद नहीं है तो वह बैंक से उधार लेगा या साहूकार के पास जायेगा , यानी वह रुपये को नगद करने के लिये पहले कहीं से नगद ( और वो भी ब्याज पर ) कर्ज़ा ले, फ़िर बाज़ार जा कर राशन की दुकान से खाद्य सामग्री की खरीदी करे । ऐसे में बैंक तो खुद ही कर्ज़ा बांटेगा और खुद ही साहूकार बन जायेगा ।

दूसरा पहलू यह है कि बैंकों द्वारा लोगों के खातें में रुपया जमा तो कर दिया जायेगा परंतु रुपये निकालना कितना सुलभ, सुगम और आसान होगा यह आपको पता ही है। शहरों, कस्बों या बड़े गावों को यदि छोड़ दें तो छोटे गावों के खाताधारी के हाथ में रुपये समय पर पहुंचाना काफ़ी कठिन साबित होगा। बैंकें इस समस्या के समाधान के रूप में बैंक-प्रतिनिधि, बैंक-दूत या मिनी ए-टी-एम जैसे साधन पेश कर रही हैं किंतु इनकी पहुंच आज भी काफ़ी कम ही है। सच तो यह भी है कि गांव के ही किसी धनी व्यक्ति जैसे मास्टर, सरपच, सचिव, रिटायर्ड कर्मचारी, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता , आदि को बैंकें अपना यह काम सोंप रही हैं जिस से यह कहा जा सकता है कि  

बैंकें स्वय ही “ साहूकार” बन रही हैं ।

“आधार कार्ड” खुद ही अधर में ?

हमने अक्सर देखा है कि सरकारी योजनाओं की घोषनाएं करने में हमारी ब्यूरोक्रेसी अधिक तीव्रता दिखाती है परन्तु उनको अमली जामा पहनानें के काम में फ़िस्सडी ही साबित होती है। आधार कार्ड बनानें के लिये जिस यूनीक़ इडेंटिफ़िकेशन अथोरिटी आफ़ इंडिया का गठन वर्ष 2008 में किया गया था उसने पिछ्ले तीन वर्षों में देश की पूरी आबादी का लग्भाग 19% या कहें कोई 22 करोड़ देश वासियों का आधार कार्ड ही बना पायी है। जनवरी 2013 को लक्ष्य मान कर केवल 51 ज़िलों के भी 80% कार्ड नहीं बन पाये थे, तो कल्पना करें कि बाक़ी का कार्य कब होगा ?

आधार कार्ड बन वाने के लिये आज भी इन ज़िलों में लोगों की लम्बी-लम्बी कतारें देखी जा रही हैं और यह काम भी प्राईवेट कमपनियों को सौप दिया गया है जो यह काम अपनी एक तय-रफ़्तार से कर रही हैं। आधार कार्ड का विरोध कुछ संस्थाओं द्वारा इस लिये भी किया जा रहा है क्योंकि इस में कार्डधारी की निजि जानकारियों  के सार्वजनिक होने का ख़तरा है। तो यह मानना उचित ही होगा कि कार्यो मे देरी, सरकारी उपेक्षा , ठेकेदारों की मनमर्ज़ी और सरकार की लापरवाही के कारण आधार कार्ड का काम आज खुद अधर में है !

अंतत: लाभ किसको ?

इस योजना को यदि एक आम आदमी की नज़र से देखें तो पायेंगे की सारे कार्य तो बैंक और आधार कार्ड के साथ जुड़ गये हैं। चाहे वह कोई अनुदान पाना हो, बच्चों के लिये वज़ीफ़ा लेना हो या राशन की दुकान से सामान, आप को किसी न किसी बिचोलिये की मदद लेनी पड़ेगी। जब किसी ग़रीब के पास राशन की दुकान से सामान खरीदने के लिये नगद होगा ही नहीं तो वह सामान कैसे लेगा (ख़रीदेगा) ? और जब वह सामान लेगा ही नहीं तो सरकार उसे कैश सब्सिडी देगी कैसे ? यानी जब अधिक लोग बाज़ार से सामान खरीदने के लायक बचेंगे ही नहीं तो लाभ तो सरकार को होना है ! गरीबी उन्मूलन, ग्राम विकास या मूल्भूत सेवाओं जैसे आम आदमी से जुड़ी योजनाओं का बजट में जब तय राशि खर्च ही नहीं होगी तो उसे गैर-बजट के मद में खर्च करने में हमारी सरकार क्यों हिच- किचायेगी ?

आम आदमी को किस तरह से सबसिडी से दूर किया जा रहा है उस को समझने के लिये उदाहरण के तौर पर एक गैस सिलेंडर को 468 रु के बजाये 1006 रु ( बैतूल में ) में खरीदना होगा और इस खरीदी का अन्तर ,यानी 538 रु , को ग्राहक के बैंक खातें मे जमा करवाया जायेगा। ध्यान रहे कि ऐसी कोई योजना फ़िलहाल सरकार के पास नहीं है जिस से आम आदमी को राशन का गेंहू- चावल , खाद ( उर्रवरक ), एल पी जी गैस, आदि की कैश सब्सिडी उस को जल्द मिल सके । 

इस योजना में वायदे कई गये है जैसे इंटरनेट से काम होने से समय कम लगेगा, पारदर्शी कार्य प्रणाली होगी, घर के दरवाज़े पर बैंक पहुंचेगी , बिचौलिये ख़त्म किये जाएंगे, आदि, आदि, लेकिन आपने पढ़ा कि किस प्रकार से सरकार ग़रीबों को लोक लुभावने सपने दिखा कर उनके मुंह से निवाला भी छीनने जा रही है ।

लाभ का सौदा तो बैंकों, उनके एजेंटों, गांव के सेठ साहूकारों और सब्सिडी के गेंहू-चावल- खाद- शक्कर- गुड़ पर चलने वाले उद्योग धंधों का ही होनेवाला है । इस योजना में अभी कैई सुधारों के आवश्यकता है।
हमें अब तक के अनुभवों से सीख कर आगे बढ
ना होगा।

This article was written on 15 May 2013. 

आप अपना फ़ीडबैक मुझे इस पते पर दें 

 

Tuesday, April 30, 2013

What is the agenda of Aam Admi Party (AAP) in Madhya Pradesh ?




The national level leadership of AAP is currently active in raising the issue of inflated electricity and water Bills in the NCR Delhi region. Arvind Kejriwal and his Team has been able to garner enough support to assimilate anger and anguish on the issues related to the common  man the Aam Admi. The youths have been enrolled as Volunteers, Technical Supporters for electricity connections and the Legal  experts are working round the clock to register, record and systemize the steps for recoiling effect of the public anger. The Delhi Government has full support of an NGO-minded son of the Chief Minister who has been handling, sometimes mishandling the issues raised by AAP. The breakaway group from Anna Movement has been steering very well under the leadership of Arvind Kerjiwal.
Aam Aadmi Party convener Arvind Kejriwal showing a faulty water meter,
which runs with air pressure in the absence of water, at a rally against
“inflated” water and power bills, in New Delhi on Sunday. Photo: Rajeev Bhatt
Arvind Kejriwal, Photo Courtsey Rajeev Bhatt.
The situation here in Madhya Pradesh is still unclear. We have not witnessed any sporadic, locally arranged and meticulously managed agitation in or around Bhopal. The State has witnessed unpredicted losses from untimely hailstorms and rains destroying most of the  cash crop and lowering the quality of wheat.

Farmers have been struggling with low prices, untimely sale of their produce and apathy from the local Agricultural Markets. This has been complicated with strict recovery rules of the local Banks who are waiting for the circulars from the State Government to put off the Cycle of recovery for some months.
Billing by the electricity companies in M.P. has so much to be corrected in the City and village level where the average billing has neither stopped nor new Billing for the new electricity Meters started in the areas where they are starting the 24X7 supply or no power cut zones. The consumers are facing the problems of excessive Billing, standing in the long queues in unhygienic conditions to deposit the Bills and facing un -scheduled power cuts for last few months.
The conditions of the welfare schemes are now being limited to regular announcements by the Chief Minister, which are hardly ever followed up by the local bureaucracy.
Compounded by steep rise in inflation, bad roads, poor infrastructures for Industries and no scope for self employment opportunities for the local youth these are some of the conditions favourable for AAP in Madhya Pradesh.
One incident which has adversely affected the RTI Movement and thus both Anna Movement and then the vigour of AAP in M.P. is the gruesome murder of Shehla Masood, an RTI Activist from Bhopal who was steering the Anna movement. CBI is probing this murder-mystery and the whole theory is revolving around the personal life , likes and dislikes , friends and foes and families of the friends of Late Shehla Masood. The political leader- criminal relationship is still not looked into and the questioning of the leaders of the political-party is limited to “courtesy calls”. The one family targeted after this murder is still facing the usual Court room and media- trials ,with no logical ends in the near future.
This incident has spread  a degree of fear among the RTI workers and activists of the State that the -power- be in the State are strong enough to limit the scope of the usage on information gathered under RTI Act. The local Political environment is not supportive to agitate the minds of the youths to come out to protest in the cases of corruptions in Madhya Pradesh. Moreover, we have seen that the issues of corruptions at higher places have been high jacked by the Political Parties, leaving a very small space for AAP to work on this.
It now depends on the local leadership to chalk out the strategy which may focus on issues of “silencing of the RTI Activist”, corruption in the bureaucracy and the reasons for this and make the spread of AAP reach the doorsteps of the common man. The Team at the district level is yet to make active efforts to constitute Mohalla, Village/ward level committees who shall remain close to the common p[people and identify the issues troubling them. They will have to enroll a very large numbers of youth who want to bring some change in the society. Train them and support them with a Team of Legal experts. Design and publish IEC Information on the local issues and in local languages.
The time is running out for AAP in M.P. They have to start early and swiftly then only there may be some notable impact on the overall Political environment in Madhya Pradesh.

Tag     arvind kejriwal,  shahla masood, aam admi party, AAP,